Teacher TET Supreme Court Decision: देशभर के लाखों सरकारी स्कूल शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं की एक श्रृंखला पर फैसला सुनाते हुए शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET पास करने की डेडलाइन को एक साल आगे बढ़ा दिया है। पहले यह डेडलाइन 31 अगस्त 2027 थी, जो अब बढ़कर 31 अगस्त 2028 हो गई है। यह फैसला उन करोड़ों शिक्षकों की जिंदगी से सीधे जुड़ा है जो बिना TET के सालों से सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। महीनों की कानूनी लड़ाई, राज्य सरकारों की पुनर्विचार याचिकाएं और शिक्षक संगठनों के संघर्ष के बाद यह आंशिक राहत शिक्षकों के हाथ लगी है।
यह फैसला न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने विभिन्न समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुनाया। गौरतलब है कि सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त और जिन शिक्षकों की सेवा में पांच वर्ष से अधिक समय शेष है, उनके लिए भी TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा। वहीं जिन शिक्षकों की सेवा में पांच वर्ष या उससे कम समय बचा है, वे बिना TET के सेवा जारी रख सकेंगे, लेकिन भविष्य में पदोन्नति का लाभ नहीं ले पाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट के इस नए आदेश से देशभर के हजारों शिक्षकों को अतिरिक्त एक वर्ष का समय मिल गया है। शिक्षक संगठनों और राज्यों की ओर से दायर समीक्षा याचिकाओं में कहा गया था कि लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को TET पास करने के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए। अदालत ने इन दलीलों पर विचार करते हुए समय-सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया, हालांकि TET की अनिवार्यता को बरकरार रखा है। यानी संबंधित शिक्षकों को अब 31 अगस्त 2028 तक TET उत्तीर्ण करना होगा, अन्यथा उन्हें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुसार निर्धारित नियमों का सामना करना पड़ सकता है।
TET क्या है और यह कब से लागू हुआ?
शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी TET की नींव शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 से जुड़ी है। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद यानी NCTE ने 2010 में TET को अनिवार्य किया। इसका मकसद यह था कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले हर शिक्षक में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता और शिक्षण कौशल हो। सरल भाषा में कहें तो TET एक अनिवार्य योग्यता परीक्षा है जो यह तय करती है कि कोई व्यक्ति प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने के लिए उचित स्तर का है या नहीं। केंद्र सरकार के स्तर पर इसे CTET कहते हैं और राज्यों में UPTET, MPTET, HTET, REET जैसे नामों से यह परीक्षा होती है। 2011 से नई भर्तियों के लिए TET पास करना जरूरी हो गया। लेकिन जो शिक्षक 2011 से पहले ही सेवा में थे, उन्हें उस वक्त इससे छूट दी गई थी। यही छूट आगे चलकर एक बड़े और लंबे कानूनी विवाद की वजह बनी।
विवाद की शुरुआत कहाँ से हुई?
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, मेघालय, पंजाब समेत कई राज्यों में यह सवाल उठा कि जो शिक्षक 1998 से 2009 के बीच मेरिट के आधार पर भर्ती हुए, उन्हें क्या TET देनी होगी? इन शिक्षकों का तर्क था कि जब हमें नौकरी मिली तब TET का नियम ही नहीं था, तो अब पुराने शिक्षकों पर नया नियम क्यों थोपा जाए? कई शिक्षकों ने कहा कि वे दशकों से पढ़ा रहे हैं, उनका अनुभव ही उनकी योग्यता है। दूसरी तरफ तर्क यह था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए हर शिक्षक का न्यूनतम मानक पर खरा उतरना जरूरी है, चाहे वो कब भर्ती हुआ हो। यह मामला अलग-अलग हाईकोर्ट से होते हुए धीरे-धीरे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और एक बड़ी लड़ाई की शक्ल ले ली।
1 सितंबर 2025 का ऐतिहासिक फैसला कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 1 सितंबर 2025 को सिविल अपील नंबर 1385/2025 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इसमें कहा गया कि देशभर के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी सेवारत शिक्षकों के लिए TET पास करना अनिवार्य है। यह नियम केवल नई भर्तियों पर नहीं बल्कि पहले से नौकरी में चल रहे शिक्षकों पर भी लागू होगा। फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे
- जिन शिक्षकों की सेवा में अभी 5 साल से अधिक समय बचा है, उन्हें TET पास करना अनिवार्य होगा।
- TET अब केवल नई भर्ती के लिए नहीं बल्कि सेवा में बने रहने और प्रमोशन के लिए भी जरूरी माना जाएगा।
- TET पास नहीं करने पर नौकरी जा सकती है और प्रमोशन भी नहीं मिलेगा।
- जिन शिक्षकों की रिटायरमेंट में 5 साल से कम समय बचा है, उन्हें इस अनिवार्यता से राहत दी गई।
- अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं से जुड़े मुद्दे पर अलग से बड़ी पीठ विचार करेगी।
- TET पास करने के लिए शुरुआत में 31 अगस्त 2027 की डेडलाइन तय की गई।
देशभर में कितने शिक्षक प्रभावित हुए?
इस फैसले का असर बेहद व्यापक था। पूरे देश में अनुमानित 20 से 30 लाख शिक्षक इस फैसले की जद में आए। राज्यवार देखें तो तमिलनाडु में अकेले सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के करीब 4 लाख 50 हजार शिक्षकों में से 3 लाख 90 हजार से अधिक शिक्षक TET योग्य नहीं थे। पंजाब में लगभग 19 हजार सरकारी स्कूलों में काम करने वाले एक लाख शिक्षकों में से करीब 40 हजार शिक्षक इस आदेश से प्रभावित हुए। मेघालय में 32 हजार से अधिक शिक्षकों पर असर पड़ा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में तो यह संख्या कई लाख तक पहुँचती है।
राज्यों और शिक्षक संगठनों का जोरदार विरोध
फैसला आते ही देशभर में हड़कंप मच गया। School Teachers Federation of India सहित दर्जनों राज्य स्तरीय संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल कीं। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि इतने बड़े पैमाने पर शिक्षकों को अयोग्य घोषित करने से पूरी स्कूल व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हो जाएंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 21-A के तहत मिले शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन होगा। मेघालय सरकार का कहना था कि इस फैसले का पूर्वव्यापी प्रभाव है और RTE लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों पर बाद के नियम नहीं थोपे जा सकते। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद शिक्षा विभाग को रिवीजन याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया। मध्य प्रदेश सरकार ने भी कोर्ट के सामने पुराने शिक्षकों को उनके अनुभव के आधार पर छूट देने की माँग रखी।
सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी कानूनी लड़ाई
महीनों तक सुनवाइयाँ चलती रहीं। अप्रैल 2026 में डायरी नंबर 1576/2026 के तहत यह मामला फिर से जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच के सामने आया। इस मामले की गंभीरता और देश भर पर इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए पीठ ने चैंबर के बजाय खुली अदालत में सुनवाई का फैसला किया। 13 मई 2026 को दोपहर दो बजे देश के कई बड़े और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत के सामने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। राज्य सरकारें, शिक्षक संगठन और केंद्र सरकार — सभी पक्षों ने अपने तर्क रखे। घंटों की लंबी बहस के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और कुछ दिनों बाद वह निर्णय सामने आ गया।
अंतिम फैसला क्या मिला और क्या नहीं मिला?
1. सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों को आंशिक राहत देते हुए TET पास करने की डेडलाइन 31 अगस्त 2027 से बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी है। यानी शिक्षकों को TET की तैयारी और परीक्षा देने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय मिल गया है।
2. 55 साल या उससे अधिक उम्र के शिक्षकों को पहले ही राहत दी जा चुकी है। जिन शिक्षकों की सेवा में 5 साल से कम समय बचा है उन्हें भी छूट मिली हुई है।
3. हालाँकि TET की अनिवार्यता का सिद्धांत पूरी तरह बरकरार है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि TET से पूरी तरह छूट नहीं मिलेगी। नौकरी बचानी है और प्रमोशन चाहिए तो 31 अगस्त 2028 से पहले TET पास करना ही होगा। यह कोई वैकल्पिक परीक्षा नहीं है, यह अब नौकरी की शर्त है।
शिक्षकों के लिए क्या है आगे की राह?
यह एक साल का अतिरिक्त समय एक सुनहरा मौका है, राहत की झपकी नहीं। देशभर के लाखों शिक्षकों को अभी से TET की तैयारी में जुट जाना चाहिए। सरकार के DIKSHA जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मुफ्त में TET की तैयारी की जा सकती है। कई राज्य सरकारें भी इन-सर्विस शिक्षकों की TET तैयारी के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की दिशा में काम कर रही हैं। राज्य सरकारों की जिम्मेदारी भी है कि वे परीक्षा के अवसर बढ़ाएं, प्रशिक्षण सुविधाएं दें और यह सुनिश्चित करें कि दशकों से पढ़ा रहे अनुभवी शिक्षक महज एक परीक्षा की वजह से सड़क पर न आ जाएं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकारें इसे कितनी संवेदनशीलता, तैयारी और ईमानदारी के साथ लागू करती हैं। एक तरफ बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है, तो दूसरी तरफ सालों से समर्पण के साथ पढ़ाते आए शिक्षकों के हितों की भी रक्षा होनी चाहिए।
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