सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, दशकों से काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को नियमितीकरण से नहीं रोक सकते Supreme Court on Temporary Employees Regularization

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दशकों से काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को केवल तकनीकी कारणों से नियमितीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा पर जोर देते हुए सरकारों और संस्थानों को मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है।

HIGHLIGHTS

• सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण पर बड़ी टिप्पणी की
• दशकों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी
• अदालत ने सरकारों को मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी
• लंबे समय तक कार्यरत कर्मचारियों को अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता

Supreme Court on Temporary Employees Regularization: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर नियमित नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी शुरुआती नियुक्ति किसी स्वीकृत पद पर नहीं हुई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के फैसले को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी। यह मामला असम सरकार के विभिन्न विभागों में मास्टर रोल पर काम कर रहे उन कर्मचारियों से जुड़ा है जो कई वर्षों से सरकारी सेवा दे रहे थे लेकिन उन्हें नियमित नहीं किया गया था। पीठ ने कहा कि एक जैसी स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार संविधान की समानता की भावना के विरुद्ध है और इसे किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Supreme Court ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई कर्मचारी लंबे समय तक सरकारी विभाग में लगातार काम करता रहा है तो उसे नियमित करने पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि शुरुआती नियुक्ति का स्वीकृत पद पर न होना, नियमितीकरण से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। सीधी बात करें तो अदालत ने यह माना कि अगर कर्मचारी वर्षों तक ईमानदारी से सेवा दे चुका है तो उसे केवल तकनीकी आधार पर बाहर करना न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने साफ कहा कि समान काम करने वाले कर्मचारियों को समान अधिकार मिलने चाहिए।

असम सरकार का तर्क और अदालत की राय

असम राज्य सरकार का पक्ष था कि इन कर्मचारियों की शुरुआती नियुक्ति स्वीकृत पदों पर नहीं हुई थी इसलिए उन्हें नियमित नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले का हवाला दिया जो इसी आधार पर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को ही रद्द कर दिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्य सरकार ने बाद में एक कैबिनेट नीति बनाकर लगभग 30 हजार समान स्थिति वाले कर्मचारियों को नियमित कर दिया लेकिन बाकी कर्मचारियों को इस लाभ से बाहर रखा गया जिसे अदालत ने गलत और भेदभावपूर्ण माना।

30 हजार को नियमित किया बाकी को क्यों नहीं?

वैसे देखा जाए तो यही सवाल इस पूरे मामले की जड़ में है। असम सरकार ने कैबिनेट नीति के तहत 30 हजार समान स्थिति वाले कर्मचारियों को नियमित किया और फिर बाकी को उसी नीति से बाहर रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को एक जैसी परिस्थिति में नियमित किया जा सकता है तो बाकी को बाहर रखना भेदभावपूर्ण है। सरकार एक जैसी स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं कर सकती। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की भावना का सीधा उल्लंघन है।

सरकार अस्थायी रखकर काम नहीं ले सकती

आप समझ सकते हैं कि जब कोई कर्मचारी दशकों तक एक सरकारी विभाग में नियमित रूप से काम करता है, उसके परिवार की आर्थिक निर्भरता उस नौकरी पर होती है और फिर उसे तकनीकी कारण बताकर नियमित करने से इनकार कर दिया जाए तो यह कितना अन्यायपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को रेखांकित करते हुए कहा कि सरकार लंबे समय तक कर्मचारियों से नियमित काम लेकर उन्हें अस्थायी दर्जे में नहीं रख सकती। निष्पक्षता और समानता संविधान के मूल सिद्धांत हैं और सरकार को उसी के अनुसार काम करना चाहिए।

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